पोर्टफ़ोलियो ट्रैक करने के तीन तरीक़े
शीट, ऐप, या कुछ नहीं। तीनों के फ़ायदे और नुक़सान, और भारत में कौन-सी चीज़ ज़रूरी हो जाती है।
ज़्यादातर लोग तीसरा तरीक़ा अपनाते हैं, यानी कुछ नहीं। उन्हें मोटे तौर पर पता होता है कि क्या है, और सही आँकड़ा कभी नहीं पता होता।
यह तब तक चलता है जब तक जुलाई नहीं आता।
तरीक़ा एक: सादी शीट
एक स्प्रेडशीट, और उसमें हर सौदे की चार चीज़ें: तारीख़, क्या, कितना, किस भाव पर। बेचने पर भी यही चार।
फ़ायदा यह है कि यह पूरी तरह आपके क़ब्ज़े में है और मुफ़्त है।
नुक़सान यह है कि इसे भरना पड़ता है। लोग दो महीने भरते हैं, फिर छोड़ देते हैं, और अधूरी शीट किसी काम की नहीं रहती।
अगर आप महीने में दो-तीन बार ही ख़रीदते हैं, तो यह काफ़ी है। सच में काफ़ी है।
तरीक़ा दो: ऐप
ऐप एक्सचेंज से जुड़कर या फ़ाइल लेकर अपने आप हिसाब रखता है।
फ़ायदा यह है कि यह अपने आप चलता रहता है, और आपको मौजूदा क़ीमत पर असली तस्वीर दिखती है।
नुक़सान यह है कि आपको उस पर भरोसा करना पड़ता है। API key देते वक़्त हमेशा read-only रखिए। जिस ऐप को ट्रेड करने या पैसा निकालने की अनुमति चाहिए, उसे वह मत दीजिए। ट्रैकर को सिर्फ़ पढ़ना है।
तरीक़ा तीन: कुछ नहीं
यही सबसे आम है और सबसे महँगा।
समस्या मुनाफ़ा नापने की नहीं है। समस्या यह है कि भारत में हर बिक्री पर टैक्स बनता है और हर बिक्री की ख़रीद क़ीमत चाहिए। वह क़ीमत अगर दर्ज नहीं है, तो आप साल भर बाद उसे बना नहीं सकते।
मैंने ऐसे लोग देखे हैं जिन्हें टैक्स से ज़्यादा परेशानी यह याद करने में हुई कि उन्होंने अठारह महीने पहले किस भाव पर ख़रीदा था।
जो भी चुनें, ये तीन चीज़ें ज़रूर रखिए
हर ख़रीद की तारीख़ और भाव। यही आपकी लागत है, और यही टैक्स तय करती है।
हर बिक्री की तारीख़ और भाव। मुनाफ़ा यहीं से निकलता है।
कटा हुआ TDS। वरना वह रिफ़ंड नहीं ले पाएँगे जो आपका है।
बाक़ी सब सुविधा है। ये तीन ज़रूरत हैं।
मैंने ख़ुद क्या किया
मैंने SmartViewAI इसीलिए बनाया, क्योंकि मुझे यही तीनों चीज़ें एक जगह चाहिए थीं और भारत के हिसाब से चाहिए थीं, जहाँ 30% और 1% TDS का हिसाब अपने आप बने।
पर साफ़ कह दूँ: अगर आपकी शीट चल रही है, तो वह ठीक है। ट्रैकर बदलने से कोई मुनाफ़ा नहीं बढ़ता। हिसाब रखने से बढ़ता है।