मुनाफ़ा कब निकालें
चढ़ने पर बेचना उतरने पर बेचने से मुश्किल है। इसका फ़ैसला पहले से कैसे लिया जाए।
गिरावट में बेचना दुख देता है। तेज़ी में न बेच पाना उससे ज़्यादा महँगा पड़ता है, और उसकी चर्चा कम होती है।
क्यों नहीं बेच पाते
जब कोई चीज़ चढ़ रही हो, बेचना ग़लत लगता है। दिमाग़ कहता है कि और चढ़ेगी। कई बार चढ़ती भी है, और वही बात याद रह जाती है।
जो याद नहीं रहता वह यह है कि आख़िर में वह वापस आ जाती है, और तब तक बेचना पहले से मुश्किल हो चुका होता है क्योंकि अब आप ऊँचे भाव याद कर रहे होते हैं।
हल: पहले तय कीजिए
जब आपके पास कोई पोज़िशन न हो, तब आप सबसे साफ़ सोच पाते हैं।
उसी वक़्त लिख लीजिए कि किस भाव पर कितना निकालेंगे। ख़रीदते वक़्त, चढ़ते वक़्त नहीं।
मैं हिस्सों में निकालता हूँ। पूरा एक साथ नहीं। यह दोनों तरफ़ की तकलीफ़ कम करता है: कुछ मुनाफ़ा हाथ में आ जाता है, और आगे चढ़े तो पूरा छूटता भी नहीं।
सबसे काम का नियम
जब आपकी लगाई हुई मूल रक़म वापस निकल आए, बाक़ी को चलने दीजिए।
इसके बाद आप मुनाफ़े के साथ खेल रहे होते हैं, अपनी बचत के साथ नहीं। इससे फ़ैसले तुरंत बेहतर हो जाते हैं, क्योंकि डर हट जाता है।
यह सबसे ज़्यादा रिटर्न वाला तरीक़ा नहीं है। यह वह तरीक़ा है जिससे लोग खेल में बने रहते हैं।
भारत का हिस्सा
यहाँ एक बात अलग है। हर मुनाफ़े पर 30% कटता है, और नुक़सान उसमें से नहीं घटता।
तो “थोड़ा निकालकर फिर वापस डाल दूँगा” वाला तरीक़ा यहाँ महँगा है। हर बार निकालने पर टैक्स बनता है, और वापस डालने पर आपकी लागत ऊँची हो जाती है।
इसका मतलब यह नहीं कि मुनाफ़ा मत निकालिए। मतलब यह है कि कम बार निकालिए, और जब निकालें तो मतलब से निकालें, हड़बड़ी में नहीं।
और निकालते ही 30% अलग रख दीजिए। जुलाई में वह पैसा ढूँढना सबसे बुरी स्थिति है।
जो काम नहीं करता
“जब सही लगेगा तब बेच दूँगा।” यह कोई योजना नहीं है।
सही तब कभी नहीं लगता। चढ़ते वक़्त लगता है कि जल्दी है, गिरते वक़्त लगता है कि अब तो रुक ही जाते हैं। यही वह दो भावनाएँ हैं जिनकी वजह से लोग पूरा चक्र बिना कुछ निकाले गुज़ार देते हैं।
काग़ज़ पर लिखा नंबर आपसे बेहतर फ़ैसला करता है, क्योंकि उसे लालच नहीं होता।